India China Hindi Chini Bye Bye boycott china

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India China Hindi Chini Bye Bye boycott china चीन भारत सीमा विवाद,भारत पर अपनी पकड मजबूत के लिए चीन विवादस्पद निति अपना रहा इसलिए चीनी कम करने की जरुरत है. चीन से भारत ही नहीं ऐसे बहुत से देश है जो चीन से एक एक हाथ करने की सोच रहा है. जिसमे रूस, जापान, ताईवान, अमेरिका,

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आज भारत के कोने कोने में चीन का बनाया हुआ एक छोटे छोटे खिलोने से लेकर बड़े बड़े मशीन मिल जायेगा. समस्या यह नहीं की भारत चीन से दुश्मनी करना चाहता है समस्या यह है की चीन भारत पर अपनी पकड़ बनाना चाहता है और ऐसा कर वह विश्व शक्ति बनाना चाहता है.

इस समय अमेरिका, चीन, रूस, जापान, इजराइल, फ़्रांस, भारत यह सभी महा सत्ता की होड़ में है इनमे से अमेरिका पहले से ही महा सत्ता है और चीन उस होड़ में बाकि देशो से आगे है. चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका को छोड़ दें तो कोई देश उसके सामने नहीं टिकता. और यही कारण है उसका यह आकलन महासत्ता बनने के सपने दिखता है.

ऐसा नहीं है की भारत चीन से चिढ़ता है या फिर भारत भी चीन को इस महासत्ता की रेस में पछाड़ना चाहता है, दरअसल चीन को यह पता है की यदि उसे महासत्ता बनाना है तो भारत जैसे देश ही उसके आगे रोड़ा अटका सकता है. और इसलिए १९६२ की भांति भारत को अपनी शक्ति से डरा कर रखना और भारत को हर वास्तु के लिए चीन पर निर्भर बनाना उसकी रणनीतिक पहल है.

इन्ही कारणों से चीन पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान जैसे छोटे छोटे देश को हर संभव मदद देकर अपनी ओर कर रहा है जिससे भारत का पडोशी देशो से मिलाने वाला साथ कम हो जाये और चीन भारत को आर्थिक, और सैन्य बल से कमजोर बना सके. साथ ही साथ अपनी सीमा को आगे बढ़ा सके.

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सबसे पहले भारत चीन विवाद को समझने की जरुरत है की क्यों बीच में बीच में चीन भारत से टांग अड़ाने की कोशिसे करता है.

दरअसल भारत और चीन का सीमा विवाद आजादी के पहले १९१४ से ही है. और वह विवाद है मैकमहोन रेखा The McMahon Line . भारतीय सीमा को लेकर एक विवाद ने तिब्बत से होते हुए हिमालय के अधिकांश हिस्से से भारतीय सीमा तय किया गया. यह सब शिमला समझौते में तय किया गया. परन्तु आज तक चीन इस समझौते को मानने से इंकार करता रहा है.

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चीन हमेशा से तिब्बत को अपना हिस्सा मानता रहा है, पर तिब्बत कभी भी इस बात के लिए राजी नहीं हुआ. यही कारण है चीन ताकत के बल पर यह करना चाहता था जिससे वहां की जनता में चीन के प्रति आक्रोश की भावना रहता है, और तिब्बती लोगो ने चीन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया पर चीन तिब्बत पर भारी पड़ने लगे तो उस समय तिब्बत के गुरु दलाई लामा ने भारत में शरण ली, इस घटना ने चीन को पूरी दुनिया सामने अपना असली चेहरा दिखने लगा.

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इन्ही कारणों से 1962 में india vs china war भारत और चीन में युद्ध हुआ चीन ने धोके से भारत पर हमला कर दिया और साथ ही साथ भारत की घटिया और भ्रष्ट युध्द निति से  नतीजतन भारतीय सेना यहाँ कमजोर पड़ी और भारत वह युद्ध हार गया जिसके कारण चीन भारत के उत्तर में कुछ और हिस्सों को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया जिसे इस समय अक्साई चीन कहा जाता है.

साथ ही साथ भारत का जानामाना तीर्थ स्थल मानसरोवर भी चीन के हिस्से में चला गया. यही कारण है की यदि भारतीयों को मानसरोवर यात्रा करना हो तो उसमे चीन की सहमती लेनी पड़ती है. जो भारत के लिए इससे बड़ी गलत बात क्या हो सकता है. उस समय के तात्कालिक प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल के कमजोर रणनीति और कूटनीति ने भारत का नुकसान कर दिया

जनरल हेंडरसन ब्रुक्स- पी एस भगत रिपोर्ट

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भारत चीन युद्ध के हार के पीछे की वजहों  को जानने के लिए भारत सरकार द्वारा युद्ध के ठीक बाद ले. जनरल हेंडरसन ब्रुक्स और इंडियन मिलिट्री एकेडमी के कमानडेंट ब्रिगेडियर पी एस भगत के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया था। दोनों अधिकारीयों द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया. क्यूंकि उन्होंने इस पूरे घटना क्रम के हार का कारण जवाहर लाल नेहरू और उनकी बेकार कूटनीति थी. साथ ही साथ उनके साथ रक्षा मंत्री, फ़ौज के कुछ और अफसरों का भी नाम भी है जो इस हार का कारण बने.

आप इन दिए गए बिन्दुओ से समझो उस रिपोर्ट में क्या खुलासा हुआ था. जो बहुत से जानकार बताते है.

  • भारतीय वायुसेना – भारतीय वायुसेना का उपयोग नही करना सबसे बड़ा कारण बताया जाता है, उस समय यह युद्ध एक ऊँचे स्थान पर हो रहा था और वहां यह लडाई में गोलाबारूद, हथियार, सैनिकी मदद पहुँचाना दोनों देश के लिए मुस्किल था, पर जानकर बताते है भारत के पास इतनी मुश्किलें नहीं थी वह कर सकता है मदद. अमेरिकी गुप्तचर के अनुसार  कि चीन के पास हवाई कार्यवाही करने के लिए उचित साधन नहीं थे. और यदि भारत इसी बात का लाभ लेकर युद्ध में सैनिको को मदद कर ता जो आज परिणाम अलग देखने को मिलता.
  • सेना को नहीं थी अधिक छुट – भारत और चीन का यह युद्ध लगभग 14000 फिट की ऊँचाई पर हो रहा था और जिसमे बहुत सैनिक शहीद हुए. इन सबके बावजूद जवाहर लाल नेहरू सेना के कामो में दखल दिए और उन्हें अधिक छुट और मदद नहीं मिला. क्यूंकि उन्हें तो सिर्फ हिंदी-चीनी भाई-भाई करना था.
  • इजराइल के मदद के सामने  नेहरु की बचकानी शर्त – इस युद्ध में इजराइल जैसा ताकत वर देश भी भारत की मदद में आगे आया वह चाहता था इस युध्द में भारत के सैनिको के साथ इजराइल के सैनिक और उनके हथियारों का उपयोग हो, पर जवाहर लाल नेहरू चाहते थे की इजराइल अपने मदद के सामानों पर भारतीय झंडा लगाए वैसे आपको बता दें की सभी देश अपने हथियार, लड़ाकू विमान आदि पर अपने देश का ध्वज लगाते है. जिससे उसकी पहचान उस देश से हो. पर जवाहर लाल उनके पहचान को हटाने को कहा जो वहां के नेताओ को यह बात सही नहीं लगा और उन्होंने मदद से इंकार कर दिया. एकदम साधारण सी बात है आप कुछ मुझे मदद करें और उसका अधिकार भी आप न लें ऐसा तो कोई नहीं करेगा.
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आपने देखा ऐसे बहुत से कारण थे इस हार के पीछे जिसमे भारतीय सेना के कुछ अधिकारी के साथ साथ भारत के बड़े नेता भी सामिल थे.

भारत ने कभी भी इस युद्ध कि कल्पना नहीं किया था, चीन ने धोखे से भारत पर हमला किया भारत कि फ़ौज अपने 15000 सैनिको के साथ चीन के 80000 सैनिको से यह युध्द लड़ा इस “सिनो इंडियन वार” भी कहा जाता है. यह पूरी लडाई 21 नवंबर 1962 को ख़त्म हुआ. चीन कको भी नुकसान झेलना पड़ रहा था इसलिए चीन ने युद्ध विराम कि घोषणा कर दिया. इसमें भारतीय सेना के 1300 जवान शहीद , करीब 1000 से अधिक घायल और 1600 सैनिक लापता हुए थे. 4000 सैनिक को बंदी बनाया गया था.

इतने नुकसान से यही कह सकते है युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है.”

रमेश कहार

बात अगर १९६२ के युद्ध का हो एक घटना पर बात नहो तो यह नाइंसाफी होगा.

जसवंत सिंह रावत Rifleman Jaswant Singh Rawat MVC

एक अकेला भारतीय फ़ौज के बराबर था. और कहने वाले तो अब इन्हें जीवित मानते है. उतराखंड का यह लाल शहीद जसवंत सिंह रावत अपने जज्बे , हौसले और देश के प्रति उनके कर्तव्यों ने चीन को धुल चटा दी थी. अकेले एक सिपाही पूरी चीनी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिए थे. कहते है करीब अकेले ७२ घंटे तक चीन के ३०० चीनी सिपाही को मौत के घाट उतार दिए और चीन को अपने देश का एक इंच भी हिस्सा जीते जी लेने नहीं दिया.

इतना अदम्य साहस, वीरता और शौर्य वाले इस भारत मा के सपूत को नमन है. मात्र 21 वर्ष कि आयु में यह जज्बा सच में एक भारतीय फौज में ही हो सकता है.

1962 के बाद चीन भारत में 3 बार और युद्ध हुआ है.

भारत के पडोसी देश पाकिस्तान और चीन हमेसा ही भारत के प्रति आक्रामक निति अपनाते रहे है यही कारण है भारत भी इनके प्रति सजगता अपनाता रहा है, भारत पाकिस्तान और चीन सीमा विवादों से समय समय पर हानिकारक परिणाम देखने को मिला है चीन के 1962 के युद्ध के बाद आगे भी युद्ध निति को झेड़ते रहा है. और भारत उसका प्रतिकूल जवाज दिया है.

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1967 की पहली लड़ाई

१९६७ के टकराव में भारत की 2 ग्रेनेडियर्स बटालियन के हाथो नाथु ला दर्रे कि सुरक्षा जिम्मेदारी को सौपा गया था. अक्सर भारतीय सीमा पर गस्त के दौरान भारत चीन सैनिको में वाद विवाद होते रहते है ये आम और सामान्य सी बात हो गयी है पर 11 सितंबर 1967 के दिन इन घटना से बचने के लिए भारतीय सेना ने नाथू ला से सेबु ला में तार बिछाने का निर्णय लिया जिससे दोनों सेनाये आपस में भिड़े नहीं. लेकिन चीन को यह पसंद नहीं आया क्यूंकि वह फिर घुसपैठ कैसे कर पायेगा, चीनी सैनिक इसका विरोध करने लगे,

ए यहीं नहीं रुके कुछ समय पश्चात् वे अपने बनकर से मशीन गन फायरिंग करने लगे. जिससे भारतीय सैनिको को बहुत नुकसान हुआ इसमें करीब ७०-७५ सैनिक मारे गए. इसके बाद  भारतीय सैनिक भी कहाँ चुप बैठने वाले थे उन्होंने भी जवाबी कार्यवाही शुरू की और देखते देखते दुश्मन देश चीन की हालत पस्त कर दिए.

भारत ने आर्टिलरी तोपों का इस्तमाल किये जिसमे चीन के कई बंकर नष्ट हो गए, चीन के अनुसार इस कार्य वाही में चीन के करीब 400 से ४५० सैनिक मारे गए. भारत की ओर से की जा रही फायरिंग का चीन के पास कोई जवाब नहीं था, चीन को नुकसान पे नुकसान हो रहा था तीन दिनों के बाद दोनों देश की हाई लेवल मीटिंग हुयी और शवों को ले जाने लगे.

1967 में ही दूसरी चीन को मुंह की खानी पड़ी

यह घटना सितम्बर के बाद अगले ही महीने अक्टूबर की है. जिसमे चीन के हरकतों का एक फिर भारतीय सेना जवाब देने में पीछे नहीं हटी. और 1967 में ही दूसरी चीन को मुंह की खानी पड़ी.

अक्टूबर में पहाड़ी इलाको में सर्दी शुरू हो जाती है, भारतीय फ़ौज यहाँ समुन्द्र सतह से करीब १३००० – १४००० की ऊँचाई पर थी, अक्सर जब सर्दी बढ़ जाती है और बर्फ बारी शुरू हो जाता है तो भारतीय सेना अपने पोस्ट खाली कर लौटने लगते है. और चीन को यह लगा की भारतीय सेना यहाँ से लौट जायेगी चीन ने नाथू ला और चो ला दर्रे की सीमा पर घुसपैठ शुरू कर दिया, पर भारतीय सेना को इसका अंदाजा था

इसलिए वह वहीँ रुकी रही और जैसे ही चीन ने घुसपैठ का जावाब एक फिर से दिया. दोनों ही सेना एक बार फिर से आमने सामने हुए और एक फिर भारतीय सेना ने प्रतिकूल जवाब चीन की सेना को दिया. इस समय भारतीय सेना की 7/11गोरखा राइफल्स एवं 10 जैक राइफल्स भारतीय बटालियनों ने चीन के नापाक इरादों को तोड़ दिया. और चीन को फिर से पीछे हटना पड़ा.

इस लडाई में घायल कर्नल राय सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया , शहादत के बाद कैप्टन डागर को वीर चक्र से सम्मानित किया गया और मेजर हरभजन सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

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1987 में चीन से की तीसरी लड़ाई

कहते न लातो के भुत बातो से नहीं मानते, चीन में यह सीमा विवाद का भुत फिर से 20 वर्ष बाद १९६७ के बाद १९८७ में आया. इस बार भी १९६७ की तरह उसे खदेड़ कर भारतीय सेना ने भगाया.

इस बार यह लडाई तवांग के उत्तर में समदोरांग चू रीजन में हुआ था. इस घटना से भारतीय सेना इस अंजाम देने के लिए मिशन ऑपरेशन फाल्कन नाम रखा. उस समय के सेना नायक जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के नेतृत्व में यह मिशन कामयाब हुआ.

१९८७ में चीन से टकराव नामका चू में हुआ, दरअसल भारतीय सेना ठण्ड में वहां से पीछे आ जाती है जब गर्मियों का मौसम आया तब भारतीय के जवान यहाँ के पोस्ट पर फिर से लौटने लगी. पर वहां देखने को मिला की चीन की सेना पहले से तंबू गाड़े रह रही थी, भारतीय सेना के लाख समझाने पर भी चीन की अड़ियल निति के कारण वह वहां से पीछे हटने को तैयार नहीं हुए.

चीन यहाँ पर पूरी तयारी के साथ आड़ी थी, उनके मसूबे साफ थे भारतीय सीमा के जगहों पर कब्ज़ा करने के लिए लेकिन भारतीय फ़ौज भी कहाँ चुप रहने वाली वह मरते दम तक अपना एक इंच जगह भी दुश्मन के हाथ जाने नहीं देने वाली. भारत यह समझ चूका था यह लातो के भुत है नहीं मानने वाले, अपने ऑपरेशन फाल्कन के अनुसार सुविधाए नहीं होने के बावजूद भारतीय सेना तुरंत यहाँ पर आनन फानन में भारतीय फ़ौज की दीवार खड़ा कर दिया.

इस ऑपरेशन फाल्कन का उद्देश्य ही था सरहद पर फ़ौज को जल्द से जल्द लाना और भारतीय देना ने अपने ऑपरेशन फाल्कन के मुताबिक पुरे जोर शोर से काम में लग गयी. वहां तवांग से आगे सडक नहीं होने के कारण जनरल सुंदर जी ने जेमीथांग में इंडियन एयरफोर्स से तत्काल बात तय कर फ़ौज को रूस से मिले हैवी लिफ्ट MI-26 हेलीकॉप्टर से वहां पर उतारना शुरू कर दिया.

भारतीय फ़ौज हाथुंग ला पहाड़ी जो एक ऊँची जगह है वहां से पोजीशन संभाल लिए क्यूंकि ऊँचाई से मारक क्षमता और दुश्मनों पर हमला करना आसान होता है यही निति चीन ने १९६२ के जंग में अपनाई थी अब भारत भी उसकी भाषा में जवाब देने के लिए तैयार थी. इस हाथुंग ला पहाड़ी से आस पास के और भी पहाड़ी इलाको पर नजर रखना भारतीय सेना के आसान हो गया.

उसके बाद जनरल सुंदर जी ने बड़ी ही चतुराई से  लद्दाख के डेमचॉक और उत्तरी सिक्किम में T -72 टैंक चीन के तरफ लगा दिए, और देखते देखते भारत की करीब ७ लाख सैनिक चीन से दो दो हाथ करने को तैयार हो गया. यह सब देख चीन को पीछे हटने के आलावा और कोई चारा नहीं था. और इस स्तिथि का लाभ लेकर भारत ने अरुणाचलप्रदेश को पूर्ण राज्य घोषित कर दिया.

ग्लोबल टाइम्स और वामपंथी विचार धारा वाले पत्रकार की सोच

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ग्लोबल टाइम्स और वामपंथी विचार धारा वाले पत्रकार की सोच १९६७ और १९८७ की घटनाओ को कभी लोगो के सामने नहीं रखते बल्कि वह १९६२ को ही परोसते है वह यह भूल जाते है की किस तरह भारतीय सेना ने १९६२ की गलतियों से सबक लेकर १९६७ और १९८७ में अपनी स्थिति को मजबूत किये. और रही बात अब की २०२० में अब भी भारतीय सेना अपने मजबूत स्थिति में है,

ऊपर की समाचार पत्र के दो टुकड़े है जिसमे एक तरफ “The Telegraph” जैसे समाचार एजेंसी की रिपोर्टिंग तो वहीँ चीन और ऐसे वामपंथी पत्रकारिताओ की धज्जिया उड़ाते Taiwan News की छापी गयी पोस्ट जो चीन और दुनिया ही नहीं भारत में छिपे गद्दार वामपंथी और कमुनिस्ट विचार और सोच रखने वालो के जले पर नमक छिडकने का काम किया है.

उसके कुछ तथ्य यह की की चीन वियतनाम के युध्द के बाद चीन कभी भी किसी और यद्ध में नहीं उतरा है जबकि भारतीय सेना पाकिस्तान और उनके आतंकियों से हमेसा एक युद्ध के माहौल में अपनी रणनीति तैयार करती रही है. जिसका फायदा भारत को हमेशा ही होता रहता है. इनके आलावा पहाड़ी इलाको में भारतीय सेना चीन के मुकाबले युध्द को एक सही परिणाम देने में चीन के मुकाबले एक अच्छी स्थिति में है.

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भारतीय सेना १९६२ के मुकाबले अपने अपने सश्त्र में भी बहुत बदलाव किये है भारतीय सेना के म्यान में सुखोई, ब्रह्मोस, उच्च क्षमता वाले मिसाइल, इनके अलावा भारतीय सीमा पर से लगे जितने भी रस्ते है उसे दुरुस्त किया गया है जिससे वहां की आवाजाही, सैनिको, युध्दक सामग्री को अब आसानी ले जाया जा सकता है.

अब भारतीय सेना अपने तमाम कमियों को दूर करने की कोशिसो में लगी है जिसके कारण आगे भविष्य में कसीमा पर किसी भी को तुरंत दूर किया जा सकता है. अब यदि माने तो भारत सैन्य शक्ति के मामले चीन से बराबरी में आँख दिखा सकता है, और दो दो हाथ करने में पूरी तरह सक्षम है.

इन तमाम कारणों से न तो चीन को कोई फायदा होगा और नहीं भारत को क्युकी जब दो बराबर के लोगो आपस में भिड़ते है तो नुकसान दोनों का होता है और यह बात चीन को समझना होगा.

भारत का आत्म निर्भर और चीन

भारत का आत्म निर्भर और चीन के साथ का व्यपार दोनों ही दो बातें है. भारतीयों को लगता है की हम चीन से किसी भी तरह का व्यपार रोक देंगे तो चीन का बहुत नुकसान हो जायेगा पर आपको बता दें की ऐसा नहीं है. दुनिया भर के बाजार पर बात करे तो चीन से १४-१५% हिस्सेदारी है. और भारत का अंतराष्ट्रीय बाजार में २% से भी कम की हिस्सेदारी है. भारत चीन को जितना निर्यात करता है उससे दुगुना भारत चीन से आयत करता है जिसमे इलेक्ट्रिक मशीनरी, न्यूक्लियर रिएक्टर, ऑर्गेनिक केमिकल्स, रत्न और आभूषण, आयरन, स्टील, फर्टिलाइजर्स, मेडिकल के  उपकरण और ऑटो कंपोनेंट्स आदि है.

इसे आप प्रो. सोमेश के. माथुर, आईआईटी कानपुर के दैनिक भास्कर में छपे एक रिपोर्ट से समझे

india vs china economy

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india vs china economy की बात करें तो दोनों में भले ही जनसंख्या लगभग सामान हो परन्तु दोनों देशो के आमदनी, उपलब्ध साधन में बहुत फर्क है. statisticstimes के अनुसार चीन और भारत दुनिया की दो विकसित अर्थव्यवस्थाएं की ओर बढ़ रहे हैं। 2019 तक, चीन दुनिया के दूसरे और भारत दुनिया के 5 वें सबसे बड़े देश हैं, पीपीपी (Purchasing Power Parity) – क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर, चीन पहले स्थान पर है और भारत तीसरे स्थान पर है। एशिया में, चीन और भारत एशिया के सकल घरेलू उत्पाद के आधे से अधिक का योगदान करते हैं।

देशों की जीडीपी

1987 में, दोनों देशों की जीडीपी लगभग बराबर थी। लेकिन 2019 में चीन का जीडीपी भारत से 4.78 गुना ज्यादा go गया है। चीन ने 1998 में $ 1 ट्रिलियन का आंकड़ा पार किया जबकि भारत ने 9 साल बाद 2007 में विनिमय दर के आधार पर पार किया। दोनों देशो का फर्क यहाँ से समझ आता है. २०१८ -१९ के अनुसार भारत का पैर कैपिटा इनकम याने पुरे देश में औसतन एक व्यक्ति की आय 10,534 रूपए है साथ ही साथ चीन का प्रति व्यक्ति आय करीब ८५०० डॉलर यानी की 5,69,500 रूपए यदि रूपए कीमत ६७ रूपए प्रति डॉलर माने.

भारत और चीन का आयत निर्यात india china trade

आयात का अर्थ है अपने देश में दुसरे देश किसी भी प्रकार की वस्तु को मांगना जो व्यापार के अनुसार अधिक आयात कराना घाटा है. वहीँ निर्यात का अर्थ है अपने देश में उत्पादन कर दुसरे देशो को वह वस्तु बेचना जो व्यापर के अनुसार फायदे मंद है.

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india china trade deficit

निर्यात को देखे तो इस  मामले में भी चीन, भारत से कहीं बेहतर  है। चीन प्रति वर्ष 2 हजार 560 अरब डॉलर का निर्यात करता है जबकि भारत प्रति वर्ष सिर्फ 423 अरब डॉलर तक है। आयात को देखे तो चीन भारत से आगे है, चीन हर साल 2 हजार 148 अरब डॉलर का आयात करता है भारत सिर्फ 516 अरब डॉलर का आयात करता है। सरकारी कर्जे का बोझ भारत पर कुल 70 प्रतिशत है, जबकि चीन पर सरकारी कर्ज 46 प्रतिशत है।

भारत का आत्म निर्भर बनाना सच में जरुरी है यदि भारत चाहता है की वह विश्व गुरु के साथ साथ विश्व शक्ति की होड़ में आगे आये तो सच में भारत का आत्म निर्भर बनाना होगा. परन्तु ए दिए आकडे देख “दूर के ढोल सुहावने लगते है” वाली कहावत याद आती है.

अब बात यह की भारत का आत्म निर्भर बन पायेगा तो जवाब यह है की बन पायेगा … उसके लिए यदि सच में हर भारतीय चाहे तब हर भारतीय को कुछ त्याग तो कुछ परिश्रम तो बहुत हद तक ईमानदारी दिखानी होगी अपने देश के लिए अपने समाज के लिए.

इस समय boycott china का ट्रेंड चला है और भारत में अक्सर समय समय पर ए होता रहा है. जब तक हमारे अंदर जोश होता है boycott china करते है जोश ख़त्म boycott china ख़त्म. अब यदि सच में boycott china को सफल बनाना है और India China Hindi Chini Bye Bye boycott china करना है तो हमारे देश के एक जाने माने वैज्ञानिक और शोधकर्ता सोनम वांगचुक जी के अनुसार क्यों boycott china करें.

boycott china product

boycott china product और भारत का आत्म निर्भर बनने के लिए भारत और भारत की जनता को अभी बहुत प्रयास की आवश्यकता है हा यह कह सकते है सोनम वांगचुक जी, भारत के बड़ी कंपनिया जैसे अमूल दूध, जैसे कम्पनियों ने India China Hindi Chini Bye Bye boycott china इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया है पर ऐसा नहीं की boycott china product यह पहली बार हुआ है, पहले भी ऐसे कुछ दिनों के जोश दिखे है, पर इस बार ऐसा लगता है की boycott china product का असर लोगो में दिखेगा, और दिखना भी चाहिए.

पर एक बात और की boycott china product का बहिष्कार करने से ही या India China Hindi Chini Bye Bye boycott china करने से ही बात नहीं बनेगा, भारत के लोगो को सच में आत्म निर्भर बनाना है तो उसे सबसे पहले रिश्वत, भ्रष्टाचार, घूसखोरी, को कम करना होगा और इसे पहले ख़त्म करना होगा. भारतीय बाजार में भारत के बने product को बढ़ावा देना होगा, सरकार इस कार्य कर रही है पर वह कार्यो में अभी भी भ्रष्टाचार, घूसखोरी, सामिल है, जिसे दूर करना हर भारतीय का काम होना चाहिए.

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अमूल दूध : India China Hindi Chini Bye Bye boycott china

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ऊपर के इन तीनो पोस्ट को भारत की अमूल दूध की कंपनी ने ट्विटर पर शेयर किया था जिसके बाद ट्विटर पर तो जैसे मानो ट्विटर युद्ध छिड़ गया हो, जब यह ट्रेंड करने लगा तो ट्विटर जैसे वामपंथी विचारो वाले ने अमूल को ट्विटर पर ब्लाक कर दिया उसके बाद फिर क्या था ऐसे लोगो की मानसिकता साफ नजर आने लगा, जब लोग हमारे देश को गाली देते है बुरा भला कहते है तब कोइ उसे ब्लाक नहीं करता है

लेकिन जैसे ही कोई भारत देश के साथ मिलकर दूसरो की बैंड बजाये तो फिर तो …. आप समझ ही सकते है पुरे देश विरोधी ताकत उसे हटाने में लग जायेंगे. अमूल के साथ ऐसा ही हुआ पर बाद में कुछ दिन बाद ट्विटर ने अमूल पर से ब्लाक हटा दिया.

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हरभजनसिंह, मिलिंद सोनम जैसे बहुत से बड़ी हस्ती चीन India China Hindi Chini Bye Bye boycott china पर चुटकी लेने लगे.

india vs china military strength 2020

भारतचीन
भारतीय नौसेना की ताकतें क्या हैं? (Indian Navy Strength)चीन की नौसेना की ताकत इस प्रकार है (Naval Strength of China)
युद्धपोत (Aircraft) के पास 1 हैविमान वाहक युद्धपोत  के पास 18 हैलड़ाकू युद्धपोत (Frigates) के पास 15 हैविध्वंसक युद्धपोत (Destroyer) के पास 10 हैछोटे जंगी जहाज़ (Corvettes)  के पास 20 हैपनडुब्बियां (Submarines) के पास 14 हैगस्ती युद्धपोत (Patrol Craft)  के पास 135 हैसमुद्री बेड़े के पास 295 हैयुद्धपोत (Aircraft) के पास 1 हैविमान वाहक युद्धपोत के पास 48 हैलड़ाकू युद्धपोत (Frigates) के पास 51 हैविध्वंसक युद्धपोत (Destroyer) के पास 35 हैछोटे जंगी जहाज़ (Corvettes) के पास 35 हैपनडुब्बियां (Submarines) के पास 68 हैगस्ती युद्धपोत (Patrol Craft) के पास 220 है समुद्री बेड़े के पास 714 है
भारत की वायुसेना की ताकतचीन की वायुसेना की ताकत
भारतीय वायुसेना में करीब 1 लाख 40 हजार सैनिक हैं.भारत के पास 1700 एयरक्राफ्ट हैं.भारतीय वायुसेना में 900 कॉम्बैट एयरक्राफ्ट हैं.भारत के पास 10 की संख्या में C-17 ग्लोबमास्टर एयरक्राफ्ट हैं जो कि एक बार में 4200-9000 किमी की दूरी तक 40-70 टन के पेलोड ले जाने में सक्षम है.सबसे अहम् भारत की फ़्रांस के साथ 126 राफेल फाइटर जेट की डील फाइनल हो चुकी है और जल्दी ही 4 विमान भारत को मिलने वाले हैं.पीपल्स लिबरेशन आर्मी एयरफोर्स दुनिया की दूसरी बड़ी वायुसेना है.चीनी वायुसेना “PLAAF” में करीब 3 लाख 30 हजार सैनिक हैं.चीन के पास 2800 मेन स्ट्रीम एयरक्राफ्ट हैं.1900 कॉम्बैट एयरक्राफ्ट हैं.चीनी वायुसेना ने 192 आधुनिक लांचर बनाये हैं.चीन के पास S-300 जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल है.

भारत के पास कुल एक्टिव सेना 13.25 लाख है. indian army ranks में भारत 3 स्थान पर है. चीन की कुल आर्मी 23.35 लाख है 
भारत का रक्षा बजट केवल US$ 70 अरब डॉलर का है.चीन का रक्षा बजट सन 2020 में यह US$179 अरब डॉलर था
india vs china military strength 2020

india vs china population

चीन की जनसंख्या अब तक 143 करोड़ है और अभी भारत की आबादी 137 करोड़ है चीन में दुनिया की 19 फीसदी और भारत में 18 फीसदी आबादी रहती है. इससे अभी चीन जनसंख्या के मामले में पहले स्थान पर है और भारत दुसरे स्थान पर एक रिपोर्ट्स के अनुसार २०३० तक भारत चीन को पीछे कर पहले स्थान पर जनसंख्या के मामले में हो जायेगा.

यह एक अच्छी भी खबर है तो बुरी भी भारत में युवा जनसँख्या बाकी देशो के अपेक्षा अधिक है जो भारत के लिए एक बहुत ही अच्छी बात है ववही चीन में चाइल्ड पालिसी के कारण युवा वर्ग कम है.

परन्तु क्षेत्रफल की दृष्टि से चीन भारत से तीन गुना बड़ा है. इस अनुसार भारत दुनिया में ७ वे स्थान पर है तो वही चीन दुसरे स्थान पर.

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धन्यवाद!

This Post Has 2 Comments

  1. be bharatiya

    kisi bhi desh ka malik vahan ki janata hoti hai aur yadi bharat ke logo ne man bana lliya boycott china ko to fir use barbad hone se koi rok nahi sakta.

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