स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad

आजाद एक ऐसा नाम जो भारतीय स्वतंत्रता कि लडाई के अंतिम चरण का अंश बना. यह वह व्यक्ति में से थे जो अपने मरते दम तक आने कसम को पूरा किये. “मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूंगा” यह चंद्रशेखर आजाद का खुद के लिए एक मंत्र के रूप में था. और इस मंत्र को अंतिम क्षण तक साबित करके दिखाए.

Who is Chandra Shekhar Azad?

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad

चंद्रशेखर आजाद (तिवारी)

पिता का नाम : सीताराम तिवारी

माता का नाम : जगरानी देवी

जन्म स्थान: उन्नाव – उत्तर प्रदेश

जन्मदिन: २३ जुलाई १९०६

इस महान सेनानी का जन्म 23 जुलाई 1906 को वे उन्नाव जिले के बदरका कस्बे में हुआ।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad biography

कहते है कि  चन्द्रशेखर आजाद जी गांधी जी से बचपन सेही बहुत प्रभावित थे. अक्सर गांधी कि बोल को वह रेडियों पर सुना करते थे. जब एक बार गाँधी जी ने असहयोग आन्दोलन कि शुरुवात किये तो पूरा देश इसका समर्थन कर रहा था. जगह जगह जुलुस, हड़ताल, आन्दोलन हो रहा था.

तब स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad जी मात्र १३-१४ वर्ष कि उम्र में सोचा यही सही समय है क्यों न वो भाग ले घर से स्कूल जाने का बहान बनाकर वो एक पास के जुलुस में घुस गए. वहा पर वो भी बाकि लोगो के साथ नारे लगाने लगे. उनकी आवाज इतनी बुलंद थी कि पास के जो पोलिस और लोगो का ध्यान आकर्षित कर रहा था.

लोगो को अच्छा लगा रहा था पर उस पुलिस वाले को यह खल नहीं रहा था. पोलिस ने कुछ लोगो के साथ साथ स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad को भी गिरफ्तार कर ली. चन्द्रशेखर आजाद जी १५ कोड़े मारने कि सजा मिली. जब उन्हें कोड़े मारे जाते तब कोडे खाते हुए बार-बार वे भारत माता की जय, वन्दे मातरम् का नारा लगाते रहे, कोड़े कोड़े खाते खाते वे बेहोस भी हो गए जब उन्हें होस आया तब उनसे उनका नाम पूछा गया जो वह इस प्रकार देते है.

नाम: आज़ाद

पिता नाम : स्वतंत्रता

घर का पता : जेल

इस घटना का वर्णन जवाहरलाल नेहरू जी अपनी एक पुस्तक में करते है;

ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह ‘भारत माता की जय!’ चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लड़का उत्तर भारत के क्रान्तिकारी कार्यों के दल का एक बड़ा नेता बना।

जवाहरलाल नेहरू

आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी। बालक चन्द्रशेखर आज़ाद का मन अब देश को आज़ाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad जी पर लोकप्रिय कवि हरिओम पंवर जी द्वारा लिखी यह कविता देश प्रेम के लिए रोम रोम जागृत कर देती है इस बार जरुर सुने.

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad – हरिओम पंवर

वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल “हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ” के नाम से जाना जाता था।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad जी व इनकी इस नई क्रन्तिकारी पार्टी से आगे चलकर बहुत से लोग जुड़े जिसमे मुख्य रूप से भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव, राजगुरु, राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचन्द्र चटर्जी, अशफाक उल्ला खाँ  जैसे क्रन्तिकारी सामिल थे. इस संघठन को चलाने के लिए व देशहित कार्य करने के लिए पैसो कि जरुरत थी

काकोरी काण्ड: स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad

जिसके लिए सभी ने लोगो के घरों में चोरी और डाके भी डाले लेकिन उन्हें यह आभास हुआ कि सभी लोग हमारे अपने ही है इसलिए आगे से उनकी पूरी टीम ने यह तय किया कि अब वह अंग्रेज अधिकारी, और अमीरों व सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया.

देश के जगह जगह पर्चे बटना, लोगो तक अपनी आवाज पहुचना, हथियार खरीदने के लिए पैसे पर्याप्त नहीं थे तब इसके बाद ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया। इस घटना के बाद अंग्रेज और भी बौखला गए थे. सभी पर मुकदमा चलाया गया कुछ को फांसी तो कुछ को जेल कि सजा भी हुए. आगे चलकर इन्हें धरपकड़ और बढ़ने लगा तब कुछ समय के लिए इन सभी ने अपने काम को निष्क्रिय कर लिए फिर जब यह मामला ठंडा हुआ तब सभी ने मिलकर सभा लिए और इसी सभा में भगत सिंह को दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया।

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन

इसी सभा में यह भी तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस नयी पार्टी में विलय कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन” का नाम बदलकर “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन” रखा गया। स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया – “हमारी लड़ाई आखरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।”

लाला लाजपतराय कि मौत का बदला, केन्द्रीय असेंबली में बम फेंक कर अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों के विरोध , लोगो में जनजागृति लाने जैसे कार्य किये.

२७ फ़रवरी १९३१ के दिन अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र द्वारा धोके से उन्हें वहां बुलाया जाता है. तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। उस पार्क को पूरी तरह से घेर लिया गया था इतना निश्चित था कि अब आजाद का वहां से निकलना संभव नहीं था. दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी हुयी. पर अक्सर स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad अपने पास एक गोली अलग से रखते थे.

इस गोलोबरी में बुरी तरह से घायल हो जाने के बाद जब उन्हें लगा कि यहाँ से बच निकला मुश्किल है तब उन्होंने अंत में खुद को गोली मारली और वह चल बसे. उन्होंने अपना कसम पूरा किये कि जीते जी कभी वह अंग्रेजो के हाथ नहीं आयेंगे. उनकी यह बहदुरी हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद Chandrashekhar Azad punyatithi

चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे।

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